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मनुष्य के चरित्र की ताकत –
डॉ हिमर्स के ७५ वे जन्मदिन पर उनका सम्मान

THE STRENGTH OF A MAN’S CHARACTER –
A TRIBUTE TO DR. HYMERS ON HIS 75TH BIRTHDAY
(Hindi)

डॉ सी एल कैगन
by Dr. C. L. Cagan

रविवार की संध्या, १० अप्रैल, २०१६ को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल
में किया गया प्रचार संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles Lord’s Day Evening, April 10, 2016

''यदि तू विपत्ति के समय साहस छोड़ दे, तो तेरी शक्ति बहुत कम है''
(नीतिवचन २४:१०)


एक मनुष्य की कीमत कैसे पता चलती है? संसार तो सीधे इसे दौलत के हिसाब से तौलता है। परंतु यीशु का कथन है, ''किसी का जीवन उस की संपत्ति की बहुतायत से नहीं होता'' (लूका १२:१५) न पैसा, न प्रतिष्ठा, न सांसारिक आनंद मनुष्य की कीमत बताता है। इसका क्या अर्थ है? हमारा पद यह कहता है,

'यदि तू विपत्ति के समय साहस छोड़ दे तो तेरी शक्ति बहुत कम है'' (नीतिवचन २४:१०)

''विपत्ति'' का अर्थ है ''जब सारी बातें आपके विरूद्व हो।'' ''साहस छोडने का '' का अर्थ है'' हिम्मत ''हार जाना।'' मैथ्यू पूल की व्याख्या कहती है, ''आपके भीतर मसीही ताकत या साहस जो विपत्ति के समय होना चाहिये का अभाव है।'' एक व्यक्ति की असल परीक्षा तब है कि जब सब बातें उसके विरूद्व तब वह कैसा व्यवहार करता है! जिनेवा स्टडी बाइबल १५९९ कहती है, ''जब तक मनुष्य परीक्षा में नहीं पडता उसकी हिम्मत की परीक्षा नहीं हो सकती'' (नीतिवचन में २४:१० ‘ब’ पर व्याख्या)

जब सब कुछ अच्छा हो तब नहीं परंतु जब सब दूर अंधेरा नजर आये तब व्यक्ति की असल परीक्षा होती है। ऐसी परीक्षा से होकर निकलने वाले हमारे एक पास्टर हैं डॉ आर एल हिमर्स! उनका जीवन दुखों से भरपूर रहा। यद्यपि वह कमजोर पडे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। डॉ बाब जोंस सीनियर (१८८३−१९६८) का कथन था, ''आप के चरित्र की परीक्षा है कि आप किन बातों के सामने हथियार डाल देते हैं।'' इसको दूसरे रूप में कहें, ''आप के चरित्र की परीक्षा है कि कुछ चीज आप को न रोक पाये।'' ''आगे बढने से अगर आप को कोई नहीं रोक पाये तो आप एक महान चरित्र के स्वामी होंगे।'' हमारे पास्टर का चरित्र ऐसा ही है!

आज रात हम उनका ७५ वां जन्मदिवस मना रहे हैं। उनका अधिकतर जीवन दुखों से भरा हुआ था। चीजें उनके विरूद्व थीं। लोग उनके विरूद्व थे। पर वह रूके नहीं सदैव चलते ही रहे। यह उनकी अपनी ताकत कदापि नहीं थी। फिलिप्पियों ४:१३ उनके जीवन का पद है, ''जो मुझे सामर्थ देता है उस में मैं सब कुछ कर सकता हूं।'' आज रात हम अपने पास्टर का सम्मान करते हैं − और प्रभु यीशु को धन्यवाद देते हैं!

मैं आपको उन बातों को बताना चाहता हूं जिनका सामना डॉ हिमर्स ने अपने जीवन में किया। उनका जीवन मसीह में बने रहकर शक्ति दृढ़ता और विजय पाने की कहानी है! जितना गहरा दुख उतनी ही गहरी ताकत के साथ वे आगे बढें।

यहां तक कि उनका बचपन अथाह दुखों से भरा हुआ था। वह एक मसीही घर में पैदा नहीं हुये। देखा जाये तो, वह एक टूटे घर से आये थे। उनके पिता दो वर्ष की उम्र में उन्हें छोड कर चले गये थे। उनकी मां सिसीलिया ने उनकी बारह वर्षो तक देखभाल की। इसके बाद वह इधर उधर रिश्तेदारों के यहां ही रहे। हाई स्कूल करने तक वह २२ स्कूलों में जा चुके थे। प्रत्येक स्कूल में वह एक ''नया बच्चा'' होते थे − बाहर से आया हुआ। '' अप्रत्यक्ष अनाथ रूप'' में वह बडे हुये − सहायता प्रेम और देखभाल के बगैर।

परमेश्वर तब भी उनका सहायक रहा। बाइबल कहती है, ''यहोवा सभों के लिये भला है, और उसकी दया उसकी सारी सृष्टि पर है'' (भजन १४५:९) परमेश्वर अपनी संतानों की चिंता करता है भले ही उन्होंने उद्वार नहीं प्राप्त किया हो। डॉ हिमर्स के भाषण और नाटक के टीचर, रे फिलिप्प, ने उनके भीतर एक्टिंग करने और भाषण देने की कला को पहचाना। वह हमारे पास्टर को पसंद करते थे और उनकी अच्छे से देखभाल की। मि फिलिप्प उनके प्रति दयालू और भले व्यक्ति थे। परंतु मैं यह जानकर प्रसन्न हूं कि डॉ हिमर्स ने बाद में थियेटर की व्यर्थता को जाना और सुसमाचार प्रचारक बन गये!

डॉ हिमर्स चर्च में बडे नहीं हुये। उनका परिवार भी टूटा था। अगर अव्छा परिवार उन्हें मिलता तो वह एक सामाजिक और मुखर − बहिर्मुखी व्यक्ति बन जाते। पर इधर उधर के भटकाव और उपेक्षा ने उन्हें अंर्तमुखी बना दिया − वह अंर्तमन में ही झांकने वाले बन गये। अपने आप में गंभीर बने रहकर उन्होंने परमेश्वर के बारे में विचार किया। आप उन्हें अंर्तमुखी नहीं समझ सकते, क्योंकि वह इतना अच्छा संदेश देते हैं, और अक्सर लोगों से बातें करते हैं। पर सत्यता यह है कि वह संवेदनशील है अपनी कमजोरी से वाकिफ है। वह अपने आप पर नहीं लेकिन परमेश्वर पर निर्भर रहते हैं।

उनके विपत्ति भरे जीवन में, मैं तो कहूंगा कि परमेश्वर का प्रेम ''अनुग्रह की खिडकी'' बनकर प्रगट हुआ। हमारे पास्टर के दो पडोसी थे डॉ और मिसिस मैकगाउन। वे उनके लिये अनुग्रह की खिडकी बनकर आये। वे उनके प्रति दयालू थे। उन्हें रात के भोजन पर भी बुलाते थे। वे उन्हें उनके चर्च भी ले गये जहां वह बैपटिस्ट बन गये। जब वह एक अकेले जवान युवक थे परमेश्वर ने दया की।

किशोरावस्था में उन्होंने तय कर लिया था कि वह अपने संबंधियों के समान नहीं बनेंगे। उन्होंने उन्हें शराब पीते और कोसते हुये देखा था। वह चर्च जाने के लिये दृढ़ संकल्पी थे और मसीही जीवन जीना चाहते थे। यद्यपि अभी तक उन्हें उद्वार प्राप्त नहीं हुआ था। उनकी स्थिति अब्राहम के समान थी जिससे परमेश्वर ने कहा था, ''अपने देश, और अपनी जन्मभूमि..........उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊंगा'' (उत्पत्ति१२:१) ।

''विश्वास ही से इब्राहीम जब बुलाया गया तो आज्ञा मानकर ऐसी जगह निकल गया जिसे मीरास में लेने वाला था, और यह न जानता था, कि मैं किधर जाता हूं; तौभी निकल गया'' (इब्रानियों ११:८)

अब्राहम पूरी रीति से नहीं जानता था कि परमेश्वर के विचार क्या है। अभी तक वह परिवर्तित भी नहीं हुआ था। पर उसने ''आज्ञा मानी और वह गया।'' यही डॉ हिमर्स ने किया। उन्होंने यीशु को नहीं जाना था। परंतु परमेश्वर ने उनका जीवन बदल दिया। धर्मशास्त्री इसे ''विश्वास के पहले विश्वास'' रखना कहते हैं − जो लोग परिवर्तन के पहले परमेश्वर को उत्तर देते हैं।

हमारे पास्टर को चर्च जाने के लिये कोई सहयोग या प्रशंसा नहीं मिली। उनके संबंधी उनकी हंसी उडाते थे कहते थे, ''राबर्ट बडा धर्मी'' है। परंतु हंसी उडाये जाने के बीच ही उन्होंने परमेश्वर की बुलाहट को उत्तर दिया। हमारा पद कहता है, ''यदि तू विपत्ति के समय साहस छोड़ दे तो तेरी शक्ति बहुत कम है।'' उनके भीतर कोई कम सामर्थ नहीं थी क्योंकि यह सामर्थ उन्हें परमेश्वर से मिली हुई थी!

यीशु कहते हैं, ''कोई मेरे पास नहीं आ सकता जब तक पिता जिस ने मुझे भेजा है उसे खींच न ले'' (यूहन्ना ६:४४) यह खींचना क्या होता है? हम अक्सर यह सोचते हैं कि जिस क्षण हम मसीह पर विश्वास करते हैं या उसके पहले, तब परमेश्वर का आत्मा हमारी आत्मा के उपर मंडराता है। लेकिन परमेश्वर का मनुष्य को अपनी ओर खींचना बहुत पहले ही प्रारंभ हो जाता है। जब परमेश्वर ने मैकगाउंस को डॉ हिमर्स को बैपटिस्ट चर्च में लाने के लिये प्रयुक्त किया, यह उन्हें खींचे जाने का ही हिस्सा था।

सत्रह वर्ष की उम्र में डॉ हिमर्स ने अपने पास्टर डॉ मैपल्स को यह कहते हुये सुना, ''यहां एक जवान है जो सेवकाई के लिये अपने को समर्पित करना चाहता है।'' डॉ हिमर्स अपने पास्टर को पसंद करते थे ओर उनके समान ही बनना चाहते थे। उनके मन में यह विचार किसने रखा? यह परमेश्वर की ओर से था। डॉ हिमर्स ने सेवकाई के लिये अपना जीवन समर्पित किया। यह परमेश्वर की ओर से खींचा जाना कहलायेगा। किसने उन्हें यह करने के लिये प्रेरित किया? यह परमेश्वर द्वारा खींचे जाने का हिस्सा था। एक समय ऐसा भी था कि वह प्रचार करने में असफल भी रहे, पर वह आगे बढते गये। बाद में उन्होंने चायनीज लोगों के लिये प्रचारक बनने का विचार किया। इसलिये वह फस्र्ट चायनीज बैपटिस्ट चर्च गये। यह भी, परमेश्वर के द्वारा उन्हें खींचे जाने का एक हिस्सा था।

१९६१ की शीत ऋतु में हमारे पास्टर बायोला कालेज गये। डॉ चाल्र्स जे वुडब्रिज एक सप्ताह तक चैपल में प्रचार कर रहे थे। डॉ वुडब्रिज चीन में पैदा हुये थे। उन्होंने फुलर सेमनरी इसलिये छोडी क्योंकि वहां उदारवाद पनप रहा था। इन दो कारणों से डॉ हिमर्स उनसे बहुत प्रभावित हुये और उनके प्रचार को बहुत ध्यान से सुना। ऐसी सारी व्यवस्था किसने की? यह परमेश्वर था! चैपल की आराधनाओं के दौरान डॉ हिमर्स ने चाल्र्स वैस्ली का भजन, ''अमेजिंग लव! हाउ कैन इट बी दैट दाउ, माय गाड, शूड डाय फॉर मी? गाया।'' उन्होंने देखा कि यीशु उनसे प्रेम करते थे और उनके लिये अपने प्राण दिये। जब डॉ वुडब्रिज प्रचार कर रहे थे, २८ सितंबर, १९६१ की सुबह १०:३० बजे का समय था डॉ हिमर्स ने यीशु पर विश्वास किया और परिवर्तित हो गये!

इस तरह, उन्होंने अपना मसीही जीवन प्रारंभ किया। यह आसान नहीं था। उन्हें कालेज जाना था। यह उनके लिये आसान नहीं था। उनके संबंधी कालेज नहीं गये थे इसलिये उन्हें कालेज जाने के लिये उनसे कोई प्रेरणा और पैसा नहीं मिला। उन्हें लगने लगा था कि वह कालेज नहीं जा पायेंगे। परंतु मिशनरी बनने के लिये उन्हें कालेज जाना था, इसलिये वह गये। परमेश्वर ने उन्हें उनका जीवन पद प्रदान किया, ''जो मुझे सामर्थ देता है उस में मैं सब कुछ कर सकता हूं'' (फिलिप्पियों ४:१३) । मसीह द्वारा दी गयी सामर्थ में डॉ हिमर्स वह सब कर पाये‚ जिसके लिये उन्होंने सोचा था कि यह नहीं हो पायेगा! वह दिन भर काम करते थे और रात में कालेज जाते थे − सालों तक वह चर्च में कई घंटे कार्य करते रहे। भले ही भले ही रास्ता लंबा और कठिन था वह डगमगाये नहीं। न केवल उन्होंने स्नातक डिग्री प्राप्त की‚ पर स्नातकोत्तर और तीन पीएचडी प्राप्त की। मसीह में बने रहकर उन्हें शक्ति प्राप्त होती थी। ''यदि तू विपत्ति के समय साहस छोड़ दे तो तेरी शक्ति बहुत कम है'' (नीतिवचन २४:१०) मसीह में होने के कारण‚ उनकी शक्ति बहुत अधिक थी!

डॉ हिमर्स ने मुझसे एक ओर व्यक्ति का जिक्र करने के लिये कहा है। जिस स्थान पर वह कार्यरत थे वहां एक मध्य वय की महिला थी जो टायपिस्ट का कार्य करती थी। वह लंबे समय के रात्रि कालेज में बुरी तरह से हताश हो गये थे। उन्होंने मुझे बताया कि अगर वह महिला नहीं होती तो वह वहां की शिक्षा कभी खत्म नहीं कर पाते।

जब मैं यह संदेश प्रचार कर चुका तो डॉ हिमर्स ने कहा कि मैं आप को उन चार लोगों के बारे में भी बताउं जिन्होंने उनकी मदद की थी। वे चायनीज चर्च के युवा दंपत्ति मर्फी और र्लोना लूम थे। जब पहली बार डॉ हिमर्स चर्च गये तो उन्होंने उन्हें एक छोटे भाई के समान सहारा दिया। वे उन्हें अपने घर ले गये। लगभग हर रविवार की रात आराधना के पश्चात वे उन्हें अपने घर रात्रि भोजन के लिये ले जाते थे। बिल्कुल सच्चे मित्र समान। तीसरे व्यक्ति जिनका डॉ हिमर्स जिक्र करना चाहते हैं वे थे मि. यूजीन विल्करसन। वह चायनीज चर्च के सदस्य एक बूढे श्वेत व्यक्ति थे। वह चायनीज चर्च के सचिव पद पर थे और अनेक कर्तव्य का निर्वाह करते थे। वह जीवनपर्यंत हमारे पास्टर के मित्र बने रहे। हमारे पास्टर ने उनके साथ बहुत सारा समय व्यतीत किया। शनिवार देर रात जब वह चर्च के लिये सूचनायें लिख कर घर लौटते तब डॉ हिमर्स उन्हें कार से घर तक छोड कर आते। उनके निधन पर उनके परिवार ने डॉ हिमर्स से प्रार्थना की कि फस्र्ट चायनीज बैपटिस्ट चर्च में उनके अंतिम संस्कार की विधि संपन्न करें। डॉ हिमर्स के एक और चायनीज जवान मित्र का जिक्र मैं करना चाहूंगा जिसका नाम जैकसन लौ था और जिसने डॉ हिमर्स की मदद की और एक उत्तम मित्र बने रहे।

चायनीज चर्च में‚ डॉ हिमर्स अपने पास्टर डॉ तिमोथी लिन (१९११−२००९) के हाथ के नीचे कार्य करते थे। डॉ तिमोथी लिन बाइबल के उत्कृष्ट ज्ञाता थे। वह एक पवित्र आदमी थे और यह विश्वास करते थे कि मसीहत बाहरी नहीं परंतु मन के भीतर जिये जाने वाला सत्य है परमेश्वर ने हमारे पास्टर को डॉ लिन के सहायक के रूप में रखा ताकि उनसे प्रशिक्षण पाकर स्वयं भी परमेश्वर के एक मजबूत व्यक्ति बने।

वे साल इतने आसान नहीं बीते। चर्च में डॉ हिमर्स एकमात्र श्वेत जवान थे। कार्य बहुत था। शुक्रवार‚ शनिवार की रात और पूरे रविवार भर प्रचार और शिक्षण करना था। सख्त अनुशासन था। पर यह उनके भले के लिये था। बाइबल में लिखा है‚ ''पुरुष के लिये जवानी में जूआ उठाना भला है'' (विलापगीत ३:२७) । परमेश्वर ने उन्हें इस कठोर मेहनत के द्वारा अपना एक महान सेवक बनाया। यह उनकी वास्तविक सेमनरी थी। परमेश्वर ने इस समय उन्हें यह प्रगट किया कि वास्तव में मसीही सेवकाई क्या है। तो वे साल बहुत कठिन थे। पर राह की कठिनाइयों ने हमारे पास्टर के चरित्र की ताकत को उजागर किया। डॉ हिमर्स डगमगाये नहीं। राह कठिन थी − पर सामर्थ अपार थी!

चायनीज चर्च एक दक्षिणी बैपटिस्ट चर्च था। इसलिये वह दक्षिणी बैपटिस्ट सेमनरी गये। परमेश्वर ने हमारे पास्टर को बाइबल के पक्ष में खडा किया भले ही वह अकेले रह गये। जब कभी वह इस अभियान में अकेले और उदास हो जाते‚ परमेश्वर उन्हें अंदरूनी ताकत प्रदान करता। ''मसीह जो मुझे सामर्थ देता है उस में मैं सब कुछ कर सकता हूं'' (फिलिप्पियों ४:१३)

एक सेवक के रूप में डॉ हिमर्स बहुत दिलेर और विश्वसनीय थे। आज के प्रचारक व पास्टर्स आसान राह का चुनाव करते हैं। न कुछ कहते हैं न करते हैं। वे इजरायल के प्रचारकों के समान बन चुके हैं जिनके विषय में यिर्मयाह कहता है‚

''और क्या भविष्यद्वक्ता क्या याजक सब के सब छल से काम करते हैं......वे शान्ति है‚ शान्ति‚ ऐसा कह कह कर मेरी प्रजा के घाव को ऊपर ही ऊपर चंगा करते हैं‚ परन्तु शान्ति कुछ भी नहीं'' (यिर्मयाह ६:१३‚१४)

परंतु जब डॉ हिमर्स ने सत्य कहा यह इतना आसान नहीं था। वह दक्षिणी बैपटिस्ट सेमनरीज में व्याप्त उदारवादिता के विरूद्व खडे हुये। इसे उजागर करते हुये एक पुस्तक भी लिखी। आज वे सेमनरीज पुरातन प्रेमी बन गयी है।

वे ऐंटीनोमिनिज्म के विरूद्व खडे हुये − अर्थात उस जीवन शैली के विरूद्व‚ जो कहती है कि मसीही जीवन भी जियो और पाप का जीवन भी व्यतीत करो। आज नये सुसमाचारक रविवार का चर्च छोड रहे हैं‚ नाच रहे हैं‚ धुम्रपान कर रहे हैं‚ मेरीजुएना का सेवन कर रहे हैं और अवैध वैवाहिक संबंध बना रहे हैं। डॉ हिमर्स ये कहते थे − और आज भी कहते हैं − जो लोग ऐसी जीवन शैली जी रहे हैं वे बिल्कुल भी मसीही नहीं हैं!

हमारे पास्टर गर्भपात के विरूद्व खडे हुये। यह आसान कदम नहीं था। वे क्लिनीक्स के सामने धरने पर बैठे‚ पुलिस उन गलियों में खडी रही‚ उन्होंने पीटे जाने और जेल में डाले जाने का भी भय मोल लिया। किंतु हमारे चर्च ने दो गर्भपात क्लिनीक्स बंद कराके ही दम लिया। विपत्ति बडी थी‚ पर डॉ हिमर्स डगमगाये नहीं। कितने अदभुत परमेश्वर भक्त हैं वह!

हालीवुड ने एक ईश निंदनीय मूवी बनाई ''दि लास्ट टैंपटेशन ओफ क्राइस्ट।'' यह सच है कि बहुत से लोग इससे सहमत नहीं हैं किंतु केवल डॉ हिमर्स इसके विरूद्व दृढ़ता से लडे! जैसे सैनिकों में कहा जाता है वह ''पाइंट मैन'' के समान हैं जो औरों से आगे बढते हैं और शत्रु से युद्व मोल लेते हैं। विपत्ति बडी थी‚ पर डॉ हिमर्स डगमगाये नहीं। अगस्त १९८८ में क्रिश्चियनीटी टूडे मैग्जीन में बोब जोंस यूनिवर्सिटी के चांसलर डॉ बोब जोंस ने कहा‚ ''मुझे ऐसा लगता है कि इस दिशा में केवल डॉ हिमर्स के प्रयास ही असरकारक थे!'' इसके बाद हालीवुड ने कभी ऐसी फिल्म नहीं बनाई! डॉ हिमर्स के राह की कठिनाईयां और दर्द यह बताता है कि वह किस प्रकार के अडिग पुरूष रहे। प्रेसीडेंट रूजवेल्ट ने कहा था‚

आलोचक का इतना मूल्य नहीं है; न उस व्यक्ति की बात इतनी वजनदार है कि फलां मजबूत जन भी लडखडा गया या फलां कर्मठ और कितना अच्छा कर सकता था। श्रेय तो उसको जाता है जो कर्म क्षेत्र में जूझ रहा है‚ चेहरा उसका धूल‚ पसीने और रक्त से सना है‚ जो वीरतापूर्वक संघर्षरत बना हुआ है......जो स्वयं को किसी भले के लिये खर्च कर रहा हो जिसे यह ज्ञात है कि अंत किसी उच्चतम प्राप्ति से होगा और अगर पराजय हुई भी तो इस बात का तो संतोष रहेगा कि हम बहादुरी से हारे‚ गिनती हमारी निष्क्रिय व कायर आत्मा वालों के साथ नहीं होगी जो न जीत जानते हैं न हार।

डॉ हिमर्स असल कर्म क्षेत्र में जूझने वाले मनुष्य हैं‚ जो पसीना और लहू के साथ संघर्षरत रहते हैं − अपने मसीहा के लिये!

डॉ हिमर्स ने एक पास्टर के रूप में भी बहुत मेहनत की। उन्होंने दो चर्चेस की स्थापना की। उनमें से एक हमारा चर्च है। किंतु चालीस साल तक हर जगह विघ्न रूकावटें विपत्तियां और जोखिम सम्मिलित रहे। जैसा शिष्य पौलुस ने कहा‚ ''क्योंकि मेरे लिये एक बड़ा और उपयोगी द्वार खुला है, और विरोधी बहुत से हैं'' (१ कुरूंथियों १६:९) यह चालीस साल का अप्रिय समय था और कई लोग उनके विपरीत बने रहे। जैसा शिष्य पौलुस ने कहा‚ ''मैं बार बार यात्राओं में; नदियों के जोखिमों में; डाकुओं के जोखिमों में; अपने जाति वालों से जोखिमों में; अन्यजातियों से जोखिमों में; नगरों में के जाखिमों में; जंगल के जोखिमों में; समुद्र के जाखिमों में; झूठे भाइयों के बीच जोखिमों में'' (२ कुरूंथियों ११:२६) । डॉ हिमर्स उस बोझ को लेकर चले जैसा बोझ पौलुस ने महसूस किया था ''सब कलीसियाओं की चिन्ता प्रति दिन मुझे दबाती है।'' (२ कुरूंथियों ११:२८) । तौभी डॉ हिमर्स ने मार्ग नहीं त्यागा। अपने आप में अपर्याप्त और अकेलापन महसूस करते रहे। लेकिन कभी राह नहीं तजी। सचमुच उनके चरित्र में अपार ताकत है!

हां, अनुग्रह की खिडकियां उनके लिये खुली रही। परमेश्वर ने उन्हें एक अदभुत पत्नी दो लडके − और एक पोती दी। सबसे अच्छा, अनेक लोगों का मन परिवर्तित हुआ। बहुत कम पास्टर्स इस संसार में लोगों का मन परिवर्तित होने में सहायता कर पाते हैं। इसके बजाय वे दूसरे चर्च से लोगों को हडपने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। डॉ हिमर्स के लिये सम्मान की बात है कि वे अन्यजातियों से लोगों को मसीह के अनुयायी बनाने में सहायक होते हैं। हम इसके लिये उन्हें पूरा सम्मान देते हैं!

तौभी, यह लडाई धोखे और विघ्न का समय बीता। हम दो कदम आगे बढते‚ एक कदम पीछे हटते − और अक्सर दो कदम आगे बढते‚ और तीन कदम पीछे हट जाते। डॉ हिमर्स धूल की नाई समझे गये‚ कभी कभी उन्होंने ऐसा भी महसूस किया। पर वह विश्वसनीय रहे। कांपे नहीं!

एक और बहुत बडी विपदा आई। चर्च के एक ''पूर्व प्रमुख अगुए'' अपने साथ ४०० लोगों को लेकर चले गए। हमारे चर्च की इमारत तो लगभग चली ही गई थी। लगभग दीवालिये हो गये थे। एक प्रसिद्व प्रचारक ने डॉ हिमर्स को सेन जोस के निकट एक चर्च में सेवा का प्रस्ताव भेजा। उन्होंने कहा, ''बाहर आने का यह अंतिम मौका है।'' पर जब सदस्य छोड कर जा रहे थे और चर्च आर्थिक नुकसानी झेल रहा था − तब डॉ हिमर्स रूके रहे! तब सिर्फ उनके कारण और चर्च के विश्वसनीय ''उनचालीस लोगों'' की वजह से जिन्होंने अपना समय और पैसा दिया‚ आज हमारे पास आप के लिये यह चर्च उपलब्ध है!

मैं यह जानता था कि मनुष्य की परीक्षा यह है कि वह कठिनाइयों में कैसे टिका रहता है। बाईस ऐसे साल थे जिसमें सब बुरा ही लगता था। जो तकलीफें हमारे पास्टर ने झेली उसमें उनका चरित्र ही उभर कर आया। विपत्ति बडी थी। पर उनके चरित्र की ताकत उभर कर सामने आयी!

अब चर्च में कोई विभाजन नहीं है। पर एक अलग प्रकार की विपत्ति है। कुछ सालों पहले डॉ हिमर्स ने मुझसे कहा था कि अभी भी उनके लिये कई परीक्षायें हैं। वह ७० साल से उपर हो गये हैं। मैं स्वयं साठ को पार कर गया हूं। तौभी मैं नहीं समझ पाया। मैंने कहा, ''क्या? क्या आप अपनी मरणशैया पर मसीह का इंकार तो नहीं करने वाले हैं!'' परीक्षायें तो थीं लेकिन मसीह में होकर हमारे पास्टर ने उम्र की इस परीक्षा को भी सम्मान और जीवंतता के साथ पार किया।

७५ की उम्र में, कैंसर के उपचार के कारण आयी कमजोरी से कई पास्टर रिटायर हो गये होते। पर हमारे पास्टर चर्च की भलाई और परमेश्वर की सेवा के लिये चलते ही रहे हैं! मैंने उन्हें बहुत कमजोर अवस्था में भी जब वे पिछली रात्रि सो नहीं पाये हों पेट में ऐंठन हो चलने में कमजोरी हो ऐसी दशा में भी पुल्पिट तक पहुंचते और प्रचार करते देखा है। और वह कैसा प्रचार करते हैं? शेर के समान! उनकी थकी अवस्था में दिये हुये संदेश भी कहीं और के संदेशों से बेहतर होते हैं यह मैं जानता हूं। इसलिये १,४०,००० से भी अधिक लोग उनके संदेश की हस्तलिपि को पढते हैं और पिछले महिने २१७ देशों में उनके विडियोज देखे गये। संसार भर में पास्टर्स उनके संदेशों से लेकर अपने चर्च में प्रचार करते हैं। वह अपने जीवन पद के आप गवाह हैं, ''मसीह जो मुझे सामर्थ देता है उस में मैं सब कुछ कर सकता हूं'' (फिलिप्पियों ४:१३)

मैं प्रार्थना करता हूं कि वह कैंसर की बीमारी से अच्छे हो जायें और अधिक सालों तक सेवकाई कर सकें। पर डा हिमर्स हमेशा नहीं जीयेंगे। बाइबल में लिखा है, ''हम को अपने दिन गिनने की समझ दे कि हम बुद्धिमान हो जाएं'' (भजन ९०:१२) अधिकतर लोग जीवन की क्षणभंगुरता के लिये नहीं सोचते। अधिकतर पास्टर्स नहीं सोचते। उनके पास योजना ही नहीं है कि जब वे चले जायेंगे तो उनके चर्च का क्या होगा। चर्च में या तो विभाजन होगा या चर्च धीरे धीरे कमजोर हो जायेगा। परमेश्वर का धन्यवाद हो कि हमारे पास्टर हमारे चर्च के लिये बहुत चिंता करते हैं! वह किसी कमजोरी या आत्म दया से अपने आगे आने वाली मृत्यु के बारे में नहीं बोलते हैं पर वह आप जवान लोगों को प्रेरित करते हैं − यह साहस और विश्वसनीयता का कार्य है! जब वह जवानों को सेवकाई में और आगे जाने के लिये कहते हैं −तो यह जिम्मेदारी, सम्मान और प्रेम की बात है!

आज हमारे पास्टर की उम्र हो गयी है, बीमारी है, और कम जीवन शेष है। विपत्ति में एक व्यक्ति का मूल्यांकन किया जाता है जब चीजें उसके विरूद्व हों। डॉ आर एल हिमर्स के रूप में हम सचमुच एक बहुत महान व्यक्ति को देखते हैं!

कैसे वह इतना सब कर पाये? कैसे संभव हुआ? सिर्फ मसीह में बने रहकर! हमारे पास्टर तो खुशी से यह कह पायेंगे, ''(एकमात्र) मसीह जो मुझे (उन्हें) सामर्थ देता है उस में मैं सब कुछ कर सकता हूं'' (फिलिप्पियों ४:१३) सामर्थ कहां से मिलती है? मसीह से, मसीह से, पुन: मसीह से!

शिष्य पौलुस ने कहा, ''तुम मेरी सी चाल चलो, जैसा मैं मसीह की सी चाल चलता हूं'' (१कुरूंथियों ११:१) मैं आप से कहता हूं, हमारे पास्टर्स के अनुयायी बनिये, क्योंकि वह मसीह के अनुयायी हैं। मसीह पर विश्वास कीजिये। मैं कहता हूं, सिर्फ मसीह, मसीह और केवल मसीह की सेवा कीजिये!

आज हम अपने पास्टर का ७५ वां जन्मदिन मना रहे हैं। हमने उनके लिये प्रेम स्वरूप एक भेंट ली है। पर आप उन्हें एक महान चर्च दे सकते हैं! मैं विचार करता हूं हमारा चर्च कैसा था, कैसा हो सकता है, और परमेश्वर के अनुग्रह से कैसा होगा! उन्हें जवानों से भरा हुआ एक चर्च दीजिये! प्रार्थना कीजिये, सुसमाचार फैलाइये, प्रेम रखिये जब तक कि हमारा चर्च ऐसा न बन जाये जैसा परमेश्वर चाहता है! उन्हें एक महान चर्च दीजिये!

अब मैं आप से पूछता हूं, कि क्या आप के पास आप के पास्टर के यीशु मसीह हैं? क्या आप के पास उनके मसीहा हैं? क्या आप ने यीशु पर विश्वास किया है? बिना यीशु के आप के पास कुछ नहीं है केवल पाप ही शेष बचता है। अगर आप विश्वास लायेंगे तो आप को उनके रक्त में पापों की क्षमा मिलेगी। अगर आप विश्वास रखेंगे, तो आप अनंत जीवन के लिये फिर जी उठेंगे। मैं प्रार्थना करता हूं कि आप यीशु पर विश्वास करेंगे। आमीन।


अगर इस संदेश ने आपको आशीषित किया है तो डॉ हिमर्स आप से सुनना चाहेंगे। जब आप डॉ हिमर्स को पत्र लिखें तो आप को यह बताना आवश्यक होगा कि आप किस देश से हैं अन्यथा वह आप की ई मेल का उत्तर नहीं दे पायेंगे। अगर इस संदेश ने आपको आशीषित किया है तो डॉ हिमर्स को इस पते पर ई मेल भेजिये उन्हे आप किस देश से हैं लिखना न भूलें।। डॉ हिमर्स को इस पते पर rlhymersjr@sbcglobal.net (यहां क्लिक कीजिये) ई मेल भेज सकते हैं। आप डॉ हिमर्स को किसी भी भाषा में ई मेल भेज सकते हैं पर अंगेजी भाषा में भेजना उत्तम होगा। अगर डॉ हिमर्स को डाक द्वारा पत्र भेजना चाहते हैं तो उनका पता इस प्रकार है पी ओ बाक्स १५३०८‚ लॉस ऐंजील्स‚ केलीफोर्निया ९००१५। आप उन्हें इस नंबर पर टेलीफोन भी कर सकते हैं (८१८) ३५२ − ०४५२।

(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व ऐबेल प्रुद्योमे द्वारा धर्मशास्त्र पढ़ा गया: डॉ. हिमर्स का पसंदीदा भजन, भजन २७:१−१४
संदेश के पूर्व बैंजमिन किंकेड ग्रिफिथ ने एकल गान गाया गया: ''दि मास्टर्स हैज कम'' (सारा डूडने, १८४१−१९२६)